धूपछाँव’ नाट्य समूह का वार्षिक कार्यक्रम
लेख-सुरभि जैन
कलाकार -धूपछाँव हिन्दी नाट्य समूह

ये तो सर्वविदित है कि जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश को कोई नहीं रोक सकता उसी
प्रकार किसी भी कला को, हुनर को ,बाहर आने से भी नहीं रोका जा सकता। परंतु कला
को दर्शाने के लिए कलाकार को आवश्यकता होती है एक ऐसे मंच की जहाँ, वह बेबाक़
तरीक़े से अपने हुनर अपनी कला को अभिव्यक्ति कर, लोगों तक पहुँचा सके। ऐसे
हुनरबाज़ो को एक ऐसा मंच प्रदान करता है अटलांटा का हिंदी नाट्य समूह धूप छाँव।
धूपछाँव ये नाम ही हम सभी के जीवन की वास्तविकता से परिचित कराता सा प्रतीत होता
है। हम सभी के जीवन को कभी सुखरूपी धूप खुशी देती है तो वहीं दूसरी ओर छाँव
रूपी दुःख हमें विचलित कर देता ये हम पर निर्भर करता है कि हम इस छाँव को अपने
ऊपर हावी न होने दे और ज़िंदगी को सुखमय तरीक़े से जिएं।

‘आनंद’ फ़िल्म का संवाद “ज़िन्दगी एक रंगमंच है और हम सब इस रंगमंच की कठपुतलियाँ
हैं”..जीवन का दर्शन समझाता-सा लगता है। ये आज भी उतना सत्य प्रतीत होता
है,जितना कल था। कुछ ऐसी ही कठपुतलियों को एक मंच देता है अटलांटा का हिंदी
नाट्य समूह धूप छाँव । जिसमें कुछ चिरपरिचित चेहरे होते हैं तो कुछ नए भी।

आज से ११ वर्ष पूर्व २००७ में इस नाट्य समूह का जो बीज बोया गया था वो यूँ वट
वृक्ष बन कर हम सभी के आँगन को अपनी छाँव से महफ़ूज़ रखेगा, शायद इसकी हमने
कल्पना भी न की होगी। आज के परिवेश में जहाँ आज हम शायद अपनी भाषा, अपनी
संस्कृति को चाहते हुए भी उतना महत्व नहीं दे पा रहे जितना कि देना चाहिए, ऐसे
में हम सभी को अपनी भाषा से,संस्कृति से, निष्पादन कलाओं (performing arts) से
जोड़े रखने का, उसे पुनर्जीवित करने का काम करता है धूप छाँव नाट्य समूह। ताकि
अपनी इस अमूल्य धरोहर को हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए संजो कर रख सकें।

प्रति वर्ष कुछ नया प्रस्तुत कर सकने के अद्भुत प्रयास के साथ पिछले वर्षों
में इस नाट्य समूह द्वारा -कई सफल नाटकों का मंचन, नृत्य प्रस्तुतियाँ, छाया
नृत्य, माइम, नुक्कड़ नाटक,कविता पाठन आदि विधाओं की उत्कृष्ट प्रस्तुतियाँ हो
चुकी हैं।
इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, इस वर्ष भी धूप छाँव नाट्य समूह १२ मई की शाम
अटलांटा के बर्कमार हाई स्कूल में अपने दल-बल सहित उपस्थित था । ३५० से अधिक कला
प्रेमियों की उपस्थिति में सभी कलाकारों ने विभिन्न प्रस्तुतियों के माध्यम से
सभी को मंत्र मुग्ध कर, उन्हें ढेर सारी तालियाँ बजाने के लिए बाध्य कर दिया। इस
वर्ष का कार्यक्रम भी एक ऐसे गुलदस्ते की तरह था जिसमें हर फूल की एक अलग ही अदा
थी, एक अलग ही ख़ुशबू और अलग ही रंग। इस गुलदस्ते की सुरभि से पूरा हॉल सुरभित
हो उठा था। मानो बहुत सारी विधाओं को एक सुंदर माला में पिरो कर लोगों के
सम्मुख प्रस्तुत कर दिया गया हो जहाँ हर कोई कार्यक्रम की प्रशंसा किए बिना न
रह सका।
इस रंगारग कार्यक्रम का का शुभारंभ धूपछाँव परिवार के सदस्य अभिनव देहरिया
द्वारा, बड़ी सुंदरता से सभी आगंतुक महानुभावों का स्वागत करते हुए हुआ।
तदुपरांत इस सफ़र को आगे बढ़ाया हमारे परिवार के वरिष्ठ सदस्य असलम परवेज़ जी
ने। जिनकी दमदार आवाज़ व सफल मंच संचालन ने, कार्यक्रम में चार चाँद लगा दिए।


इस खूबसूरत सफ़र का पहला पड़ाव था हिंदी नाटक “आधे अधूरे”। मोहन राकेश जी द्वारा
रचित इस नाटक को बेहद ही संजीदगी एवं ख़ूबसूरत तरीक़े से मंच पर प्रस्तुत किया
धूप छाँव परिवार के कलाकारों ने। वैसे तो इस नाटक का ५०००० से भी अधिक बार सफल
मंचन सिर्फ भारत के विभिन्न शहरों में ही हो चुका है, परंतु अटलांटा में ऐसे
संजीदा नाटक को लोगों के सामने रख पाना ही बेहद चुनौतीपूर्ण काम था। लोगों की
तालियों ने निस्सेंदेह ये स्पष्ट कर दिया की हम इस चुनौती को परिपूर्ण कर पाने
में सक्षम रहे।
“आधे अधूरे” कहानी है एक ऐसे मध्यमवर्गीय परिवार की जिसमें पिता व माँ के अलावा
दो बेटियाँ और एक बेटा है। सम्पूर्ण सा लगने वाला ये परिवार अपने को आधा अधूरा
सा पाता है, परिवार का हर सदस्य अपना अस्तित्व खोजता सा नज़र आता है। इस नाटक
में एक ओर पति पत्नी के टूटते रिश्ते को दिखाया गया तो दूसरी ओर बच्चे भी घर
में उस प्यार के अभाव में ज़िंदगी की दूसरी ही राह पकड़ लेते हैं। हम सभी की
रोज़ मर्रा की ज़िंदगी के कुछ अनसुलझे से सवालों व रिश्तों की पेचीदगियों को
बख़ूबी दर्शाता है ये नाटक। मोहन राकेश की इस सुंदर रचना को निर्देशित किया
धूपछाँव नाट्य समूह की संस्थापिका संध्या भगत जी ने। इस नाटक में भाग लेने वाले
कलाकार थे सचिन बापट, विजय ग़ौड़, मोहम्मद शोएब, मोईज हुसैन, ऋतंभरा मित्तल,
आशीष कपूर, संजू चौधरी एवं सुरभि जैन। संगीत दिया जयेश जुरानी ने।

धूपछाँव नाट्य समूह का कुछ नया ‘स्वाद’ देने का अपना ही तरीका है सो मध्यांतर
में फ़्लैश मॉब के ज़रिए रोचक प्रस्तुति दी। जिसमें दर्शकों ने भी भरपूर साथ
दिया ,कोई भी अपने को रोक न पाया, हमारे कलाकारों के साथ में बिना झूमे और
गुनगुनाए।
कैफेटेरिया में अलग ही समा बँध गया। इस नृत्य का आगाज़ करने वाले धूपछाँव के
कलाकार थे रेनू कुमार, श्री वोरा,सुरभि जैन, तान्या ओझा, अंशिका मिश्रा, रचना
भाटिया और राज वोरा । नृत्य निर्देशन किया तराना विज ने।

मध्यांतर के बाद शुरु हुआ इस मनोरंजन भरी शाम का का दूसरा पड़ाव जिसमें एक बहुत
ही मनोरंजक हास्य नाटिका की प्रस्तुति हुई, जिसका नाम था “फ़ेसबुक की फिसलन“।
जी हाँ आज के आधुनिक परिवेश में इससे बेहतर विषय क्या हो सकता है, लोगों को
बांधे रखने का। परंतु जहाँ एक ओर नाटक के ज़रिए आज की विषम परिस्थितियों को
बहुत ही सहज रूप से रखा गया वहीं साथ ही एक महत्वपूर्ण संदेश भी पहुँचाया गया ।
हमने अपने आप को इस डिजिटल दुनिया के मोहपाश में इस क़दर बाँध लिया है कि हम
अपनी और अपनो की दुनिया से हम निरंतर दूर होते जा रहे हैं। लोगों की तालियों एवं
सराहना से स्पष्ट था की संदेश उन तक बख़ूबी पहुँचा। इस नाटक को लिखा था जयेश
जुरानी ने एवं निर्देशन किया संध्या भगत जी ने। भाग लेने वाले कलाकार थे माधव
कातदरे, रेनू कुमार, वीना कातदरे, अंशिका मिश्रा, राजुल मिश्रा, राहुल भाटिया,
मीनाक्षी मेहता, तान्या ओझा, श्री वोरा, निधि पीपल और सीमा गर्ग।

कार्यक्रम की अगली प्रस्तुति थी बॉलीवुड नृत्य, जिसका विषय था ‘आखिरी पड़ाव’,
इसे बहुत ही अनूठे अन्दाज़ में प्रस्तुत किया, हमारी होनहार कलाकार रेनू
थापलियाल कोटनाला ने, एक श्रद्धाँजली थी, मशहूर अदाकारा श्री देवी के नाम उनके
ही मशहूर गानों द्वारा।
कुछ लोग नाचना चाहते हैं और नहीं भी। सो इनका ख्याल रखते हुए संयोजिका लेकर आई
नया विषय “लेज़ी डान्स” एक अनोखे अन्दाज़ के साथ जिस तरह धूपछाँव के कलाकारों
ने मंच को सजाया दर्शक वाह वाह किए बिना ना रह पाए। इस अनूठे डान्स को
निर्देशित किया निधि पीपल ने और संकल्पना थी संध्या भगत का। भाग लेने वाले
कलाकार थे अंशिका मिश्रा, आशा गुप्ता, जयेश जुरानी, मोईज हुसैन, निधि पीपल,
पुनीत भटनागर, राहुल भाटिया, रेनू कुमार, संजू चौधरी,मीनाक्षी मेहता, सीमा गर्ग,
श्री वोरा, सुरभि जैन, तान्या ओझा, वीना कातदरे और आशीष कपूर।
जिस तरह किसी भी इमारत की मज़बूती उसकी नींव पर निर्भर करती है उसी प्रकार किसी
भी कार्यक्रम की सफलता का श्रेय सिर्फ़ मंच पर प्रस्तुति देने वालों तक सीमित
नहीं रहता बल्कि कार्यक्रम को सफल बनाने में जितना परिश्रम परदे के आगे वाले
कलाकारों का होता है उतना ही परदे के पीछे काम करने वाले अनेक जाबाँजो का भी
होता है। उनकी मेहनत के बिना कोई कार्यक्रम सफलता के परचम को नहीं छू ही नहीं
सकता। इस कार्यक्रम को सफल बनाने में मंच के पीछे जिन्होने पूरी मेहनत के साथ
चार चाँद लगाए उनके नाम इस प्रकार हैं- ब्रोशर डिज़ाइन किया अनिल भगत एवं
गंधर्व भगत ने। दानकर्ताओं से संपर्क विजय टंडन व अनिल भगत। कार्यक्रम स्थल पर
योगदान दिया गुरुपदेश बेदी, परेश जैन, सरफ़राज़ खान, शबाना सईद, गीतांजली
तालुकदार, मनजीत बेदी, मधुर गुप्ता ने। भोजन व्यवस्था को बख़ूबी सम्हाला संजीव
अग्रवाल, पवनदीप सिंह, निधि मिश्रा एवं आलम शेख़ ने। स्टॉल्ज़ व्यवस्था पर थे
आकांशा राजपाल तथा कार्तिकेय भगत। कार्यक्रम के दौरान म्यूज़िकल स्लाइड शो
प्रस्तुत की जयेश जुरानी ने।

मंच सज्जा एवं सेट निर्माण कार्य किया मोईज हुसैन, मोहम्मद शोएब, गंधर्व
भगत,सचिनबापट,विजय गौड़, नीदा शैरीफ,एकता नरूला सेठी, कार्तिकेय भगत तथा अनिल
भगत ने। प्रकाश व्यवस्था को बखूभी सम्हाला अभिनव देहरिया वेशभूषा तथा प्राप्स
सम्हालने का दायित्व निभाया रचना भाटिया, रेनू कुमार ने। मेकअप द्वारा सभी
कलाकारों को सुंदर बनाने का कार्य किया तलत अलवी तथा श्री वोरा ने। कार्यक्रम
को सुंदर स्मृतियों में बदलने यानी की विडीओ तथा पिक्चर्स ले कर हर पल को
यादगार बनाया पुनीत भटनागर, एकता नरूला सेठी, आयुष झा ने।
संगीत के बिना तो कोई भी महफ़िल नीरस ही लगती है, तो हमारी शाम को जिन सदस्यों
ने सुरमयी बनया वो थे- संदीप सांवला व शील सांवला ने।

तो इस तरह कुछ नए कुछ पुराने प्रतिभाशाली कलाकारों के साथ धूप छाँव परिवार ने
एक बार ये पुनः सोचने पर विवश कर दिया की अगर कोई भी काम पूरी मेहनत पूरी लगन
के साथ किया जाए तो निहसंदेह लोगों तक आपकी बात ज़रूर पहुँचती है।
वित्त के बिना तो कुछ संभव ही नहीं सो उन महानुभवों को हम कैसे भूल सकते हैं
जिन्होने आर्थिक मदद करके हमें सहयोग दिया वे नाम हैं शमीम दलवाई व डॉ नाज़नीन
दलावई जो हमारे समूह के सदस्य तो हैं ही साथ ही पिछले ८ वर्षौ से हमारी अर्थिक
मदद कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त कुछ और नाम हैं जीतन सिंह,पटेल भाई (patel
brothers),२७ ग्रुप(27 investment groups) आदि।

धन्यवाद टी.वी. एशिया का व अंजली छाबरिया का जो हमारे समूह की सदस्या भी हैं।
अटलांटा के मीडिया का आभार जो पिछले कई वर्षों से हमारा साथ दे रहा है।
इसी आशा के साथ कि ऐसे ही मनोरंजन से भरपूर कार्यक्रमों की शृंखला ले कर आपके
सम्मुख उपस्थित होते रहेंगे और हिंदी भाषा व दक्षिण एशियाई संस्कृति से को सभी
से जोड़ने का, इसके वर्चस्व को क़ायम रखने का प्रयास सतत जारी रहेगा। हमारी इस
मनोरंजन भरी शाम का समापन हुआ।
नोट- यदि आप हमें संपर्क करना चाहते हैं तो नीचे लिखे नंबर पर फोन करें या ईमेल
से संदेश भेजें।
संध्या सक्सेना भगत
फोन-404 585 7247
Email-dhoop.chaoon@gmail.com
Dhoopcahoon.org